Sunday, March 24, 2019

गीत-बागों में आवाज़ गूंजती। (कोयल की कहानी)

बागों में आवाज़ गूंजती सबको यही पुकारती,
दुनियां मतलब की है यारो अपना आप संवारती।

एक दिन शिकारी बाग में तीर चलाने आया था,
तीर लगा मासूम चिढ़ी को एक फ़ूल मुरझाया था।
दोनों टांगें टूट गई थीं चलने से बेकार हुई,
दर्दे दिल कोयल ने देखा,सेवा को तैयार हुई।
दोनोँ टांगें तोड़के अपनी चिड़िया को यह दान दिया,
चिड़िया बोली न भूलूंगी,तूने जो एहसान किया ।
कोयल अब चल फिर न सकती,पंख उडारी मारती,
दुनियां मतलब की है सारी,................।

एक बुलबुल को पकड़ा किसी ने,पंख उसके काट दिए,
एक सुंदर तकदीर के देखो किसने पन्नें फाड़ दिए ।
बदकिस्मत फिर हो गई वह तो,उड़ने के न योग्य रही,
कैसा यह आज़ाद देश है,रात दिनों वह सोच रही।
कोयल ने जब खबर सुनी तो, उड़ती उड़ती आ गई,
अपने सारे पंख चीरकर, कोयल को लगा गई।
चलना फिरना उड़ना उसका,बन्द हो गया आखरी,
दुनियां मतलब की है सारी,..................।

लेखक:
औमेश्वर नारायण

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