Thursday, February 19, 2015

अविनाशी सनातन पुरुष परात्पर ब्रह्म भगवान् श्री कृष्ण


ਮੇਰੇ ਸਕੂਲ ਦੇ ਮੇਰੇ ਸਾਥੀ ਅਧਿਆਪਕ ਸ਼੍ਰੀ ਰਵੀ ਸ਼ੰਕਰ ਸ਼ਰਮਾ ਜੀ ਮੇਰੇ ਪਰਮ ਮਿੱਤਰ ਹਨ.ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਗੱਲਬਾਤ ਕਰਕੇ ਬਹੁਤ ਸਾਰਾ ਰੱਬੀ ਗਿਆਨ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ.ਉਹ ਜਲੰਧਰ ਸ਼ਹਿਰ ਵਿੱਚ ਨਿਕਲਣ ਵਾਲੀ ਸ਼੍ਰੀ ਗੀਤਾ ਜੇਯੰਤੀ ਮਹੋਤ੍ਸਵ ਕਮੇਟੀ ਦੇ ਕਰਤਾ-ਧਰਤਾ ਵੀ ਹਨ .ਸਾਹਮਣੇ ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਤਸਵੀਰ ਹੈ ਅਤੇ ਨੀਚੇ ਉਹਨਾਂ ਵੱਲੋਂ ਮਿਲਿਆ ਇੱਕ ਲੇਖ ਦਾ ਕੁਝ ਹਿੱਸਾ ਮੈਂ ਲਿਖਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕੀਤੀ ਹੈ .ਇਹ ਲੇਖ ਪੰਜਾਬ ਕੇਸਰੀ ਵਿੱਚ ਵੀ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਿਤ ਹੋ ਚੁੱਕਾ ਹੈ.
            ਸ਼੍ਰੀ ਰਵੀ ਸ਼ੰਕਰ ਸ਼ਰਮਾ ਜੀ ਦੀ ਹਿੰਦੀ ਅਤੇ ਸੰਸਕ੍ਰਿਤ ਉੱਤੇ ਚੰਗੀ ਪਕੜ ਹੈ. ਉਹਨਾਂ ਦਾ ਭਾਸ਼ਣ ਵੀ ਕਾਫੀ ਦਮਦਾਰ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਇਸ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਸ਼ੱਕ ਨਹੀਂ ਹੈ.ਹੇਠਾਂ ਲਿਖਿਆ ਲੇਖ ਇਸ ਗੱਲ ਦੀ ਪ੍ਰੋੜਤਾ ਕਰਦਾ ਹੈ .

अविनाशी सनातन पुरुष परात्पर ब्रह्म भगवान् श्री कृष्ण

परात्पर ब्रह्म ,सब के आदि कारण, आदि-अंत से रहित,माया से परे,सभी भूत प्राणियों के सनातन बीज ,सर्वलोक महेश्वर,सभी प्राणियों के सुह्यदय,वेदों तथा उपनिषदों द्वारा जानने योग्य ,सभी जीवों दे एकमात्र आश्रय एवं भगवान् कृष्ण हैं,ऐसा सभी पुराणों एवं धर्म ग्रंथों डा सार तत्व है . वह श्री हरि भगवान् ,जब जब पृथ्वी पर अधर्म बढ़ता है, सत्य ,अहिंसा, दया, करुणा इत्यादि धर्म के मूलभूत सिधान्तों का परित्याग कर जब आसुरी प्रवृति के लोग अपने मनमाने आचरण से समाज को दूषित करते हैं तब भक्तों के रक्षार्थ तथा उद्दार हेतु हर युग में प्रकट होते हैं तथा धर्म की स्थापना करते हैं .
  श्री गीता जी में भगवान् अपने श्री मुख से इसकी उदघोषणा करते हैं “धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे.”
      भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को,रोहिणी नक्षत्र में अर्द्धरात्रि को भगवान् श्री कृष्ण का प्राकट्य कंस के कारागार में, देवकी तथा वसुदेव की आठवीं संतान के रूप में हुआ. भगवान् श्री कृष्ण ने मथुरा की प्रजा को न केवल कंस के अत्याचारों से मुक्त कराया अपितु भयंकर असुरों का असुरों का संहार कर समाज को भयमुक्त किया. श्रीमदभागवत महापुराण में भगवान् श्री कृष्ण की बाल-लीलाएं अत्यंत मनोहारी तथा आनंद प्रदान करने वाली हैं.
भगवन श्रीकृष्ण माया के बंधन से छुड़ाने वाले हैं.उनकी भक्ति से मनुष्य कर्मबंधन से मुक्त होकर सहज ही परमपद प्राप्त कर लेता है.सभी दैवी शक्तियों ने भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति क्र ही शक्तियां प्राप्त कीं और सभी लोगों में पूज्य हुईं, ऐसा पुराणों का कथन है. सभी देवता भगवान् श्री कृष्ण द्वारा विधान किए गये फलों को ही प्रदान करते हैं .इसलिए श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर भगवान् श्रीकृष्ण के निमित्त किया जाने वाला व्रत सभी अभीष्ट वर प्रदान करवाने वाला होता है.
     भगवान् श्री कृष्ण नित्य रूप से गोपवेश में अपनी परम आह्लादिनी शक्ति श्री राधा जी के साथ द्विभुज रूप में शाश्वत गोलोक धाम में निवास करते हैं तथा चतुर्भुज रूप में लक्ष्मी जी संग वैकुंठ में निवास करते हैं.मोह तथा आसक्ति का परित्याग करने वाले ,सब भूतप्राणियों में द्वेष भाव से रहित,इच्छा द्वेष इत्यादि विकारों से मुक्त, ऐसे सदा अपने चित्त को भगवान् में लगाने वाले भक्त ,वैकुंठ तथा गोलोक धाम जाने के अधिकारी होते हैं .

एक भक्त की पूंजीभगवान् की भक्ति ही होती है. भक्त सुदामा ,यशोदा नंदराय जी,देवकी,वासुदेव ,अर्जुन,शबरी,हनुमान जी ,विभीषण इत्यादि असंख्य भक्तों ने अपना सर्वस्व भगवान् के आत्मसम्मान को सर्वोपरि स्थान दिया. 

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